الحبُّ في الإقامة الجبريّة ( نزار قباني )

Posted on 22 ديسمبر 2011 بواسطة



الحبُّ في الإقامة الجبريّة ( نزار قباني ) 

 

 1 

فالدمُ الذي كنتُ أحسبُ أنه لا يصبح ماءً.. 

أصبح ماءً.. 

والسماءُ التي كنتُ أعتقد أن زُجَاجَها الأزرقْ 

غيرَ قابلٍ للكسر.. إنكسرتْ.. 

والشمسُ .. 

التي كنتُ أعلِّقها كالحَلَق الإسبانيّ 

في أُذُنيكِ.. 

وقعتْ مني على الأرض.. وتهشَّمتْ.. 

والكلماتُ.. 

التي كنتُ أغطّيكِ بها عندما تنامينْ.. 

هربت كالعصافير الخائفهْ.. 

وتركتكِ عاريهْ… 

بين نهديكِ.. 

أو لمضاجعتكْ.. 

لم أعد متحمّساً للهجوم على أيِّ شيءْ.. 

أو للدفاع عن أيِّ شيءْ.. 

فقد شقطنا في الزَمَن الدائريّْ… 

حيثُ المسافةُ بين يدي وخاصرتكِ.. 

لا تتغيّرْ… 

وبين أنفي ومسامات جلدكِ.. 

لا تتغيّرْ.. 

وبين زنزانةِ فَخْذَيْك.. 

وساحةِ إعدامي.. 

لا تتغيّرْ… 

أستأذنكِ.. 

بالخروج من هذا الزمن الضيِّقْ.. 

والعواطفِ الجاهزةِ كإفطار الصباحْ 

ككمبيالية مستحقّةِ الدفْعْ… 

أستأذنكِ.. 

بأخذ إجازة طويلةٍ.. طويلهْ.. 

فلقد تعبتُ.. 

من حالة اللاشوق.. واللاحُبّ.. التي أنا فيها.. 

التي صارتْ عواطفي مربّعة كجدرانِها.. 

أريد أن أتظاهرَ ضدَّ حبّك الفاشيستيّْ 

وأطلقَ الرصاصَ.. 

على قصركِ.. 

وحَرَسِكِ.. 

وعَرَبَتكِ البُورجوازيةِ الخيولْ.. 

أريدُ.. أن أحتجَّ على سلطتكِ السرمديَّهْ.. 

الذي سميتِ به نفسكِ.. 

أريدُ أن أطلقَ الرصاصْ.. 

على صورتك الزيتيّةِ.. 

المعلَّقَةِ في صالة العرشْ.. 

وعلى كلِّ الشعراءِ، 

والنبلاءِ، 

والسفراءْ.. 

الذين يدفعونَ لِعينيكِ الجزيَهْ.. 

ويسقونَ نهديكِ.. 

حليبَ العصافيرْ… 

أريدُ أن أطلق الرصاصْ.. 

على ملابسكِ المسرحيَّهْ.. 

وعلى عُدّة الشغل التي تستعملينها في التشخيصْ.. 

على الأخضر.. والليكليّْ.. 

على الأزرق.. والبرتقاليّْ.. 

على عشراتِ القوارير التي جمعت فيها فصائلَ دمي.. 

على غابة الخواتم والأساورْ.. 

التي استعملتِها لابتزازي… 

المصنوعة من جلد التمساحْ.. 

على دبابيس الشَعْر.. 

ومباردِ الأظافرْ… 

والسلاسل المعدنيَّهْ.. 

التي لجأتِ إليها.. 

لأخْذ اعترافاتي… 

أريدُ أن أطلقَ الرصاصْ.. 

على صوتكِ المتسلِّل عَبْر أسلاك الهاتفْ 

فلم أعدْ مهتماً بهواية جَمْع العصافيرْ… 

أريد أن أطلق الرصاصْ.. 

على حروف اسمك.. 

فلم أعد مهتماً.. 

بهواية جمع الأحجار النادرَهْ.. 

أريد أن أطلقَ الرصاصْ.. 

على كلّ قصائدي.. التي كتبتُها لكِ.. 

وعلى كلّ الإهداءاتِ الهيستيريّه.. 

في ساعات الحُبّ الشديدْ.. 

في ساعات الغباء الشديدْ.. 

أريدُ أن أذهب إلى البحرْ.. 

حيث الشواطئ مفتوحةٌ ككتابٍ أزرقْ 

ففمي.. أصبح كغابة الفِطْر.. 

من قلَّة الشمسْ.. 

وعواطفي أصبحتْ كالمخطوطات القديمَهْ.. 

من قلّة الزائرينْ.. 

وقلّة القراءةْ… 

أريدُ.. 

أن أكسرَ دائرةَ الطباشيرْ.. 

وأنهي هذه الرحلة اليوميَّه.. 

بين شفتكِ العليا.. وشفتكِ السفْلى.. 

بين جسدك البارد كمدن النحاس 

10 

أريدُ أن أحتجَّ على شيء ما… 

أن أصطدمَ بشيءٍ ما.. 

أن أنتحرَ من أجل شيءٍ ما.. 

فلم يعُدْ عندي ما أفعلُهْ.. 

سوى أن ألعب الورقَ مع ضَجَري 

هو يخسرُ.. وأنا أخْسَر.. 

هو يخبرني أنكِ كنتِ حبيبَهُ.. 

هو يعطيني مسدّسَهُ لأنتحرْ.. 

وأنا أطلعُهُ على مكاتيبك القديمَهْ.. 

فيقتُل نفسَهُ… 

ويقتلُني… 

11 

أستأذن في أن أقتلكِ.. 

إنني أعرف أن كلَّ غمائم السماءْ.. 

وكلَّ الحمائم ستفرش ريشها الأبيض.. تحت 

وكلَّ شقائقَ النُعْمانْ.. 

ستطلع من حقول جسدكْ.. 

ولكنْ برغم هذا.. 

سأبقى مصمّماً على قتلكْ.. 

لا من أجلي وحدي.. 

ولكن من أجل كلِّ الأسرى.. والجرحى.. ومشوَّهي 

الحُبّ.. 

ومن أجل كل الذين حكمتِهمْ بالأشغال الشاقّة 

المؤبَّدهْ.. 

وفرضتِ عليهم. 

أن ينقلوا الرملَ بملاعق الشاي.. 

من نهدكِ الأيمنْ.. إلى نهدكِ الأيسرْ.. 

من نهدكِ الأيسر.. إلى نهدكِ الأيمنْ.. 

……………………………………………………. 

ولا يزالونَ يشتغلونْ.. 

و … لا … ي … ز … ا … ل … و … ن … 

ي … ش … ت … غ … ل … و … ن … 

وكلَّ الحمائم ستفرش ريشها الأبيض.. تحت 

رأسِكْ 

وكلَّ شقائقَ النُعْمانْ.. 

ستطلع من حقول جسدكْ.. 

ولكنْ برغم هذا.. 

سأبقى مصمّماً على قتلكْ.. 

لا من أجلي وحدي.. 

ولكن من أجل كلِّ الأسرى.. والجرحى.. ومشوَّهي 

الحُبّ.. 

ومن أجل كل الذين حكمتِهمْ بالأشغال الشاقّة 

المؤبَّدهْ.. 

وفرضتِ عليهم. 

أن ينقلوا الرملَ بملاعق الشاي.. 

من نهدكِ الأيمنْ.. إلى نهدكِ الأيسرْ.. 

من نهدكِ الأيسر.. إلى نهدكِ الأيمنْ.. 

……………………………………………………. 

……………………………………………………. 

ولا يزالونَ يشتغلونْ.. 

ولا يزالونَ يشتغلونْ.. 

و … لا … ي … ز … ا … ل … و … ن … 

ي … ش … ت … غ … ل … و … ن …